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कृतज्ञता का महत्व", "मानसिक शांति के उपाय", "शुक्राना का जादू", "Spirituality in daily life".

शिकायत से शुक्राने तक: जीवन बदलने वाला महामंत्र

प्रस्तावना: क्या हम वास्तव में जी रहे हैं?

​आज के आधुनिक युग में इंसान एक ऐसी दौड़ में शामिल है जिसका कोई अंत नहीं है। हमारे पास रहने के लिए घर है, लेकिन हम महल की चाहत में दुखी हैं। हमारे पास पहनने को कपड़े हैं, लेकिन हम ब्रांड्स की कमी का रोना रोते हैं। विडंबना यह है कि हम उस 'अभाव' को गिनने में इतने व्यस्त हैं जो हमारे पास नहीं है, कि हम उस 'प्रभाव' को देखना ही भूल गए हैं जो परमात्मा ने हमें पहले से दे रखा है।

'शुक्राना' का अर्थ केवल 'धन्यवाद' कहना नहीं है, बल्कि यह महसूस करना है कि हमारे जीवन में जो कुछ भी है—चाहे वह छोटा हो या बड़ा—वह ईश्वर की विशेष कृपा है।

अभाव की मानसिकता बनाम बहुतायत की दृष्टि

​मनोविज्ञान और अध्यात्म दोनों ही मानते हैं कि हमारा मन उसी दिशा में भागता है जहाँ हम उसे ले जाते हैं।

शिकायत का रास्ता: जब हम उन चीजों पर ध्यान देते हैं जो हमारे पास नहीं हैं, तो मन में ईर्ष्या, क्रोध और असुरक्षा का जन्म होता है। इससे 'मन का भारीपन' बढ़ता है।
शुक्राने का रास्ता: जब हम अपनी उपलब्धियों और ईश्वर की दी हुई नियामतों को गिनना शुरू करते हैं, तो हमारे भीतर संतोष और शांति का संचार होता है।

​"जिसके पास कृतज्ञता का हृदय है, उसके पास हमेशा उत्सव मनाने का कारण होता है।"

क्यों ज़रूरी है शुक्राना? (वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण)

1.मानसिक भारीपन से मुक्ति: जब हम शिकायत करते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में तनाव पैदा करने वाले हार्मोन (Cortisol) बढ़ते हैं। वहीं, 'शुक्राना' करने से 'डोपामाइन' और 'सेरोटोनिन' जैसे हैप्पी हार्मोन्स का स्राव होता है।

2.​परमात्मा से सीधा जुड़ाव: शुक्राना एक ऐसी प्रार्थना है जो बिना मांगे ही सब कुछ दिला देती है। जब आप ईश्वर को धन्यवाद देते हैं, तो आप ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा के साथ तालमेल बिठा लेते हैं।

3.​रिश्तों में मधुरता: जब आप अपने जीवनसाथी, बच्चों  और मित्रों के प्रति कृतज्ञ होते हैं, तो आपके रिश्तों की कड़वाहट खत्म होने लगती है।

शुक्राना करने के 5 व्यवहारिक तरीके

1 'शुक्राना डायरी' (The Gratitude Journal)

    ​रोज रात को सोने से पहले डायरी में ऐसी 5 बातें लिखें जिनके लिए आप उस दिन ईश्वर के आभारी हैं। यह कुछ भी हो सकता है—जैसे किसी अजनबी की मुस्कुराहट, बच्चों के साथ बिताया समय, या सिर्फ एक सुकून भरी चाय।

    2. 'वर्तमान' में जीना सीखें

    ​अक्सर हम कल की चिंता में आज का आनंद नहीं ले पाते। जब आप वर्तमान में होते हैं, तभी आप उन छोटी-छोटी खुशियों को देख पाते हैं जो ईश्वर ने आपको दी हैं।

    3. शब्दों की शक्ति का प्रयोग

    ​अपनी शब्दावली से "काश मेरे पास यह होता" हटाकर "ईश्वर का शुक्र है कि मेरे पास यह है" को जगह दें। आपके शब्द ही आपके भविष्य का निर्माण करते हैं।

    4. मौन प्रार्थना

    ​दिन में कम से कम 5 मिनट मौन बैठें। कुछ मांगें नहीं, बस मन ही मन कहें—"हे परमात्मा, आपने मुझे जितना दिया है, मैं उतने के भी लायक नहीं था। आपका कोटि-कोटि धन्यवाद।"

    5. दूसरों की मदद के जरिए शुक्राना

    ​यदि परमात्मा ने आपको दूसरों की मदद करने के काबिल बनाया है, तो यह उसका सबसे बड़ा उपहार है। किसी जरूरतमंद की सेवा करना भी 'शुक्राना' व्यक्त करने का एक तरीका है।

    एक कहानी: सुकून का असली पता

    ​एक बार सिया ने अपनी माँ से पूछा, "माँ, हमारे पड़ोस वाले घर में तो बहुत बड़ी गाड़ी आई है, हमारे पास वैसी क्यों नहीं है?" माँ ने मुस्कुराकर सिया को खिड़की के पास बुलाया और बाहर बारिश में भीगते हुए एक गरीब बच्चे को दिखाया जो फटे हुए प्लास्टिक की ओट में हंस रहा था।

    ​माँ ने कहा, "बेटा, दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक वो जो ऊपर देखकर दुखी होते हैं कि उनके पास 'क्या नहीं है', और दूसरे वो जो नीचे देखकर ईश्वर का धन्यवाद करते हैं कि उनके पास 'क्या-क्या है'। हमारे पास सिर पर छत है, थाली में भोजन है और एक-दूसरे का साथ है। क्या यह किसी बड़ी गाड़ी से कम है?" नन्ही सिया समझ गई कि सुकून बड़ी चीजों में नहीं, बल्कि शुक्रगुजार होने में है।

    निष्कर्ष: शुक्राना ही असली धन है

    ​जीवन में मुश्किलें आएंगी, चुनौतियां भी होंगी। लेकिन यदि आपके पास 'शुक्राना' करने वाला हृदय है, तो आप हर मुश्किल को पार कर लेंगे। याद रखिए,

    परमात्मा को शिकायत करने वाले लोग पसंद नहीं हैं, बल्कि वे लोग प्रिय हैं जो उसकी रज़ा में राजी रहते हैं।

    ​आज से ही शिकायत का हाथ छोड़िए और शुक्राने का दामन थाम लीजिए। आप पाएंगे कि मन का वह भारीपन, जो सालों से आपको थका रहा था, अचानक गायब हो गया है।

    ​"आज आप ईश्वर को किस एक बात के लिए धन्यवाद देना चाहते हैं? कमेंट्स में जरूर बताएं।"

सफलता में देरी का मतलब असफलता नहीं है! (चीनी बांस की कहानी)

सफलता में देरी का मतलब असफलता नहीं है! (चीनी बांस की कहानी)

         बांस की यह कहानी धैर्य (Patience) और दृढ़ता              (Persistence) को समझाती हैं।

​      कहानी: "चीनी बांस का रहस्य"

​एक बार एक व्यक्ति अपनी असफलताओं से बहुत परेशान हो गया था। उसने सोचा कि अब मेहनत करने का कोई फायदा नहीं है। वह एक ज्ञानी व्यक्ति के पास गया और पूछा, "मैं इतनी मेहनत करता हूँ, लेकिन मुझे सफलता क्यों नहीं मिलती? क्या मुझे हार मान लेनी चाहिए?"

​ज्ञानी व्यक्ति उसे अपने बगीचे में ले गए और वहां लगे 'फर्न' (Fern) के छोटे पौधों और 'चीनी बांस' (Chinese Bamboo) के ऊँचे पेड़ों को दिखाया।

​उन्होंने कहा, "जब मैंने फर्न और बांस के बीज बोए, तो मैंने दोनों की बहुत देखभाल की। पहले साल में फर्न बहुत जल्दी बढ़कर हरा-भरा हो गया, लेकिन बांस के बीज से कुछ भी बाहर नहीं निकला। मैंने हार नहीं मानी।"

​"दूसरे, तीसरे और चौथे साल भी फर्न और घना होता गया, लेकिन मिट्टी के ऊपर बांस का नामो-निशान तक नहीं था। फिर भी मैंने उसे पानी देना और खाद डालना जारी रखा।"

​"फिर पांचवें साल में, अचानक एक छोटा सा अंकुर मिट्टी से बाहर आया। और जानते हो क्या हुआ? अगले 6 हफ्तों के भीतर वह बांस का पेड़ 80 फीट से भी ज्यादा ऊँचा हो गया!"

​ज्ञानी व्यक्ति ने उस व्यक्ति की आँखों में देखते हुए कहा, "क्या तुम्हें लगता है कि वह बांस का पेड़ सिर्फ 6 हफ्तों में इतना बड़ा हो गया? नहीं! उन 5 सालों में वह जमीन के नीचे अपनी जड़ें (Roots) मजबूत कर रहा था। अगर उन सालों में उसकी जड़ें मजबूत नहीं होतीं, तो वह इतनी ऊँचाई को संभाल ही नहीं पाता।"

सीख (Moral):

जब आप मेहनत कर रहे हों और परिणाम न मिल रहे हों, तो समझ लीजिए कि आपकी 'जड़ें' मजबूत हो रही हैं। आपकी सफलता में लगने वाला समय आपकी नींव को तैयार कर रहा है। बस धैर्य रखें और आगे बढ़ते रहें।

"क्या आप भी अपनी 'जड़ें' मजबूत करने के दौर से गुजर रहे हैं?कमेंट करके बताइए।

।।जय श्री राधे।।


कहानी: "टूटा हुआ घड़ा और उसकी अनोखी पहचान"

कहानी: "टूटा हुआ घड़ा और उसकी अनोखी पहचान"

​एक किसान के पास दो बड़े घड़े थे। वह रोज़ उन्हें एक डंडे के दोनों सिरों पर लटकाकर नदी से पानी भरकर लाता था। एक घड़ा बिल्कुल सही था और पूरा पानी घर तक पहुँचाता था। लेकिन दूसरा घड़ा थोड़ा टूटा हुआ था। जब तक किसान घर पहुँचता, आधा पानी रास्ते में ही रिस चुका होता था।

​दो सालों तक ऐसा ही चलता रहा। सही घड़ा अपनी कार्यक्षमता पर बहुत गर्व करता था, लेकिन टूटा घड़ा अपनी कमी के कारण बहुत शर्मिंदा रहता था।

​एक दिन, नदी के किनारे, टूटे घड़े ने किसान से कहा, "मैं आपसे माफ़ी माँगना चाहता हूँ।"

​किसान ने पूछा, "क्यों? किस बात के लिए?"

​घड़े ने कहा, "मेरी दरार की वजह से पिछले दो सालों से आप आधी मेहनत ही घर तक पहुँचा पा रहे हैं। मैं अपनी कमी के कारण आपके लिए बोझ बन गया हूँ।"

​किसान मुस्कुराया और उसने बहुत प्यार से कहा, "आज जब हम घर वापस जाएँगे, तो रास्ते के किनारे ध्यान से देखना।"

​जैसे ही वे घर की ओर चले, टूटे घड़े ने देखा कि रास्ते के उसकी वाली तरफ सुंदर फूल खिले हुए हैं। सही घड़े की तरफ की ज़मीन बिल्कुल सूखी थी।

​किसान ने कहा, "मैंने तुम्हारी दरार के बारे में बहुत पहले ही जान लिया था। इसलिए, मैंने रास्ते के तुम्हारी तरफ फूलों के बीज बो दिए थे। हर दिन, जब हम नदी से वापस आते थे, तो तुम अनजाने में ही उन्हें सींचते रहे। अगर तुम ऐसे नहीं होते, तो क्या मुझे कभी ये सुंदर फूल मिल पाते? आज जो ये रंग-बिरंगे फूल मेरे घर को सजाते हैं, वह सिर्फ तुम्हारी वजह से ही संभव हुआ है।"

​टूटा घड़ा यह सुनकर भावुक हो गया। उसने महसूस किया कि उसकी कमी, जिसे वह अपनी सबसे बड़ी कमजोरी मानता था, वास्तव में एक वरदान थी।

​इस कहानी से सीख (Moral):

​हम सभी में कुछ न कुछ कमियाँ होती हैं। लेकिन व्यक्तिगत विकास का मतलब सिर्फ़ उन कमियों को दूर करना नहीं है, बल्कि उन्हें एक नए दृष्टिकोण से देखना भी है। अक्सर, हमारी सबसे बड़ी कमियाँ ही हमें दूसरों से अलग और विशेष बनाती हैं। सही दृष्टिकोण और दृढ़ता से, हम अपनी हर कमजोरी को अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल सकते हैं।

क्या आपको यह  ज्ञान वर्धक कहानी अच्छी लगी,तो कमेंट करके बताइए।

।।जय श्री राधे।।

क्या आपका 'मानसिक कप' भरा हुआ है? (Is your mental cup full?)

क्या आपका 'मानसिक कप' भरा हुआ है? (Is your mental cup full?)

        कहानी: "खाली कप और अधूरा ज्ञान"

​एक शहर में एक बहुत ही सफल नौजवान रहता था। उसके पास सब कुछ था—पैसा, शोहरत और सुख-सुविधाएं, लेकिन उसे हमेशा लगता था कि उसे सब कुछ पता है। वह दूसरों की सलाह सुनना पसंद नहीं करता था।

​एक दिन वह एक एकांत पहाड़ी पर रहने वाले एक बुजुर्ग गुरु से मिलने गया। वहां जाकर उसने गुरुजी को अपनी उपलब्धियां गिनानी शुरू कर दीं और अंत में कहा, "मैं यहाँ आपसे कुछ नया सीखने आया हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि मैं पहले से ही बहुत कुछ जानता हूँ।"

​गुरुजी मुस्कुराए और बोले, "सीखने से पहले थोड़ी चाय पीते हैं।"

​गुरुजी ने युवक के सामने एक कप रखा और केतली से चाय डालनी शुरू की। कप भर गया, लेकिन गुरुजी चाय डालते रहे। चाय कप से बाहर निकलकर फर्श पर बहने लगी।

​युवक चिल्लाया, "रुकिए! आप क्या कर रहे हैं? कप भर चुका है, अब इसमें एक बूंद भी नहीं आ सकती!"

​गुरुजी शांत भाव से बोले, "बिल्कुल इस कप की तरह, तुम भी अपने ज्ञान और अहंकार से पूरी तरह भरे हुए हो। जब तक तुम अपना कप (दिमाग) खाली नहीं करोगे, तब तक मैं तुम्हें कुछ भी नया कैसे सिखा सकता हूँ?"

​युवक को अपनी गलती समझ आ गई। उसने महसूस किया कि व्यक्तिगत विकास के लिए सबसे पहली शर्त है—'सीखने की इच्छा और विनम्रता'

​इस कहानी से सीख (Moral):

​हमारा दिमाग एक पैराशूट की तरह है, यह तभी काम करता है जब यह खुला हो। व्यक्तिगत विकास के लिए यह मानना ज़रूरी है कि हमें अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।


ज्ञानवर्धक कहानियां, प्रेरणादायक कथाएं, आध्यात्मिक कहानियां, आत्मज्ञान, भक्ति, हिंदी कहानियां

🌼 ज्ञानवर्धक छोटी कहानियां | जीवन बदलने वाली प्रेरणादायक कथाएं

✨ प्रस्तावना

हमारे जीवन में छोटी-छोटी बातें ही बड़े बदलाव लाती हैं। कभी एक छोटी सी सीख, एक सरल कहानी या एक गहरा विचार हमारे सोचने का तरीका बदल देता है।

इसीलिए आज हम आपके लिए कुछ ज्ञानवर्धक छोटी कहानियां लेकर आए हैं, जो आपको आत्मज्ञान, शांति और सही दिशा की ओर प्रेरित करेंगी।

                  🌿 1. असली धन

एक बार एक धनी व्यक्ति एक संत के पास गया और बोला—

“महाराज, मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मन अशांत रहता है।”

संत ने उसे एक कटोरा दिया और उसमें पानी भरकर कहा—

“इसमें एक मुट्ठी नमक डालो और पीकर बताओ।”

व्यक्ति ने ऐसा किया और बोला— “पानी बहुत कड़वा है।”

फिर संत उसे नदी के पास ले गए और बोले—

“अब यही नमक नदी में डालो और पानी पीकर देखो।”

इस बार पानी सामान्य था।

संत ने समझाया—

“दुख नमक जैसे हैं, और मन उस पात्र जैसा जिसमें तुम उन्हें रखते हो। मन छोटा होगा तो दुख भारी लगेंगे, मन बड़ा होगा तो वही दुख हल्के लगेंगे।”

शिक्षा

हमें अपने मन को विशाल बनाना चाहिए, तभी जीवन में शांति मिलती है।


                       🌿 2. ईश्वर कहाँ हैं?

एक छोटा बालक रोज मंदिर जाकर भगवान से पूछता—

“भगवान, आप कहाँ रहते हैं?”

एक दिन पुजारी ने कहा—

“बेटा, भगवान हर जगह हैं।”

बालक ने इस बात को समझने के लिए लोगों की सेवा करना शुरू किया—

वह अपनी माँ की मदद करने लगा, भूखों को भोजन देने लगा।

कुछ दिनों बाद वह मंदिर आया और बोला—

“अब मुझे पता चल गया कि भगवान कहाँ हैं।”

पुजारी ने पूछा— “कहाँ?”

बालक बोला—

“जहाँ प्रेम, सेवा और सच्चाई है, वहीं भगवान हैं।”

✨ शिक्षा

ईश्वर बाहर नहीं, हमारे अच्छे कर्मों और भावनाओं में बसते हैं।


               🌿 3. अहंकार का अंत

एक विद्वान पंडित अपने ज्ञान पर बहुत गर्व करता था।

एक दिन वह एक साधु के पास गया और बोला—

“मैंने सभी शास्त्र पढ़ लिए हैं।”

साधु ने मुस्कुराकर पूछा—

“क्या आपने स्वयं को भी जाना है?”

पंडित चुप हो गया।

साधु बोले—

“जब तक मनुष्य स्वयं को नहीं जानता, तब तक उसका ज्ञान अधूरा रहता है।”

✨ शिक्षा

सच्चा ज्ञान वही है जो हमें अपने भीतर झाँकने और समझने की प्रेरणा दे।

🌸 निष्कर्ष

ये छोटी-छोटी कहानियां हमें जीवन की बड़ी सच्चाइयों से परिचित कराती हैं।

यदि हम इनकी सीख को अपने जीवन में अपनाएं, तो हमारा जीवन अधिक शांत, संतुलित और सार्थक बन सकता है।

इसलिए रोज़ एक अच्छी बात सीखें और अपने जीवन को बेहतर बनाए।


कल्याण–बौद्ध प्रेरक ग्रंथ में से

                    जीवन का कम्बल 

दो साधु थे किसी भक्त ने दोनों को बहुमूल्य गर्म कंबल उपहार मैं दिए दिन भर यात्रा करने के बाद दोनों साधु रात को धर्मशाला में ठहरे। सर्दी की रात थी। जब सोने का समय हुआ तो एक साधु ने सोचा कि कंबल कीमती है कहीं ऐसा ना हो की रात के समय कोई चुरा ले जाए। उसने लपेटकर तह करके सिरहाने लगाया और सो गया।दूसरा साधू जब सोने लगा तब उसने देखा कि सर्दी से कुछ बच्चे कांप रहे थे और उनके दांत किटकिटा रहे थे, साधु को दया आ गई, उसने अपना कंबल उन ठिठुरते हुए अनाथ बच्चों उड़ा दिया।

            सुबह जब दोनों साधु उठे तब दोनों में से किसी के पास कंबल नहीं था।एक ने अपनी इच्छा ए बच्चों को ओढ़ा दिया था और दूसरे के सिर के नीचे से किसी ने खिसका लिया था। अपनी इच्छा से अपना कंबल त्यागने वाला प्रसन्न था,परन्तु चोरी हो गए कंबल का मालिक साधु बहुत दुखी था।

यह जीवन रूपी कंबल भी एक न एक दिन सबसे छिन जाता है,इस संसार से वियोग तो निश्चित है,इसलिए जो स्वेच्छा से सांसारिक पदार्थो में आसक्ति को त्याग देता है,उसे कोई दुख नहीं व्याप्ता,पर जो उससे चिपटा रहता है, वह सदा ही दुखी रहता है।

(कल्याण , बोधकथा अंक से)


तत्त्वबोधपरक प्रार्थनाएं | आत्मज्ञान और भक्ति की दिव्य प्रार्थनाएं

                           वैदिक प्रार्थना

तत्त्वबोधपरक प्रार्थनाएं आत्मज्ञान, भक्ति और परमात्मा से जुड़ने का मार्ग दिखाती हैं। जानिए इन प्रार्थनाओं का गहरा अर्थ और आध्यात्मिक महत्व हिंदी में।

ॐ पूर्णमद: पूर्नमिदम् पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाविष्यते।।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

ॐ वह (परब्रह्म)पूर्ण हैं,यह ( कार्यब्रह्म)भी पूर्ण हैं; क्योंकि पूर्ण से पूर्ण ही निकलता है,(प्रलय काल में) पूर्ण(कार्यब्रह्म)- का पूर्णत्व लेकर पूर्ण (परब्रह्म)ही शेष रहता है।ॐ शांति शांति शांति।     (यजुर्वेद)

ॐ सह नाववतु।सह नौ भुनक्तु।सह वीर्य करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

ॐ वह प्रसिद्ध परमेश्वर हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए। हम दोनों एक साथ मिलकर वीर्य यानी विद्या की प्राप्ति के लिए सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो हम दोनों परस्पर द्वेष ना करें ओम शांति शांति।।( कृष्ण यजुर्वेद)

ॐ असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मामृतं गमयेति।

असत् से मुझे सत् की और ले चलो, अंधेरे से मुझे प्रकाश की ओर ले चलो मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो (बृहदारण्यकोपनिषद)

ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

 उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।

दिव्य गंध से युक्त, मृत्युरहित, धन–धान्य वर्धक,त्रिनेत्र रुद्र की हम पूजा करते है।वे रुद्र हमें अपमृत्यु और संसार रूप मृत्यु से मुक्त करें।जिस प्रकार ककड़ी का फल अत्यधिक पक जाने पर अपने डंठल से मुक्त हो जाता हैं,उसी प्रकार हम भी मृत्यु से छूट जाए;किंतु अभ्युदय और नि:श्रेयसरुप अमृत से हमारा संबंध न छूटने पाए।(यजुर्वेद)

ॐ भूर्भुव स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि।

      धियो यो नः प्रचोदयात्।।

सत् चित्, आनन्द स्वरुप और जगत के श्रृष्टा ईश्वर के सर्वोत्कृष्ट तेज का हम ध्यान करते है। वे हमारी बुद्धि को शुभ प्रेरणा दे।।(यजुर्वेद)

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षःशान्तिः पृथ्वी शन्तिराप: शन्तिरोषध्य: शान्तिः।

वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिः सर्वम शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।

द्युलोक शान्त हो; अंतरिक्ष शांत हो,पृथ्वी शांत हो,जल शांत हो, औषधियाँ शांत हो, वनस्पतियाँ शांत हो, समस्त देवता शांत हो, ब्रह्म शांत हो, सब कुछ शांत हो, शांत–ही– शांत हो और मेरी वह शांति निरंतर बनी रहें।(यजुर्वेद)

                            बौद्ध–प्रार्थना

      नमो तस्स भगवतो अर्हतो सम्मा सम्बुद्धस्स।

     नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स॥

      नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स॥


         बुद्धं शरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि।

            सङ्घं शरणं गच्छामि।

            दुतियम्पि बुद्धं शरणं गच्छामि।

            दुतियम्पि धम्मं शरणं गच्छामि।

             दुतियम्पि सङ्घं शरणं गच्छामि।

             ततियम्पि बुद्धं शरणं गच्छामि।

             ततियम्पि धम्मं शरणं गच्छामि।

             ततियम्पि सङ्घं शरणं गच्छामि।

      पाणातिपाता वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।

      अदिन्नादाना वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।

       कामेसु मिच्छाचार वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।

        मुसावादा वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।

     सुरामेरय मज्जपमादट्ठाना वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।

🌸 अर्थ (सरल हिंदी में)

मैं बुद्ध, धम्म (धर्म) और संघ की शरण में जाता/जाती हूँ।

मैं पाँच नियमों का पालन करने का संकल्प लेता/लेती हूँ —

हिंसा न करना, चोरी न करना, गलत आचरण से बचना, झूठ न बोलना, नशा न करना।

मैं सभी प्राणियों के सुख और कल्याण की कामना करता/करती हूँ।

आप  सबका दिन शुभ हो।

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